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लोकसभा में मंत्रियों की गैरहाजिरी पर स्पीकर सख्त, प्रश्नकाल के दौरान जताई कड़ी नाराजगी

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लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान एमएसएमई मंत्रालय से जुड़े मंत्री सदन में मौजूद नहीं मिले, जिस पर स्पीकर ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री को भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के निर्देश दिए।

नई दिल्ली, आलम की खबर। लोकसभा में बृहस्पतिवार को प्रश्नकाल के दौरान उस समय असहज और गंभीर स्थिति बन गई, जब सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय से जुड़े सवालों की बारी आई, लेकिन जवाब देने के लिए न तो संबंधित कैबिनेट मंत्री सदन में मौजूद थे और न ही राज्य मंत्री। इस अप्रत्याशित स्थिति ने सदन की कार्यवाही के दौरान एक तरह की असहज चुप्पी पैदा कर दी, जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने खुलकर नाराजगी जताई और स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जाएगी।

यह घटना केवल एक औपचारिक चूक भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे संसदीय जवाबदेही और सदन के प्रति मंत्रियों की जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रश्नकाल संसद की कार्यवाही का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है, जहां सांसद सरकार से सीधे जवाब मांगते हैं। ऐसे में यदि संबंधित मंत्रालय के मंत्री ही मौजूद न हों, तो यह स्थिति सरकार के लिए असहजता का कारण बनना स्वाभाविक है।

प्रश्नकाल में अचानक आई असहज खामोशी

सदन में प्रश्नकाल के दौरान जब एमएसएमई मंत्रालय से जुड़ा सवाल सूची में आया, तो परंपरा के मुताबिक संबंधित सांसद ने अपना प्रश्न पढ़ा। इसके बाद अध्यक्ष ने जवाब देने के लिए मंत्री का नाम पुकारा। लेकिन सदन में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। पहली बार में जवाब न आने पर अध्यक्ष ने दोबारा नाम पुकारा, फिर भी स्थिति जस की तस रही।

इसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि संबंधित मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री जीतन राम मांझी सदन में मौजूद नहीं हैं। जब अध्यक्ष ने यह जानना चाहा कि राज्य मंत्री कौन हैं, तब यह जानकारी सामने आई कि शोभा करंदलाजे भी उस समय सदन में उपस्थित नहीं थीं। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने तत्काल कड़ी आपत्ति जताई और नाराजगी जाहिर करते हुए संसदीय कार्य मंत्री से कहा कि इस पूरे मामले को गंभीरता से नोट किया जाए।

स्पीकर ने क्यों जताई इतनी सख्ती?

लोकसभा अध्यक्ष की नाराजगी का कारण सिर्फ मंत्रियों की अनुपस्थिति नहीं थी, बल्कि यह भी था कि प्रश्नकाल को संसद की जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण मंच माना जाता है। इस दौरान सरकार के मंत्री सीधे सांसदों के सवालों का जवाब देते हैं और यही वह समय होता है, जब जनता से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा होती है।

ऐसे में यदि किसी मंत्रालय की बारी आने पर सदन में कोई मंत्री मौजूद ही न हो, तो यह न केवल संसदीय परंपरा के खिलाफ माना जाता है, बल्कि सदन की गरिमा पर भी सवाल खड़े करता है। यही वजह रही कि अध्यक्ष ने इस मामले को हल्के में लेने के बजाय सख्त शब्दों में चेतावनी दी।

उन्होंने साफ कहा कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं होनी चाहिए और इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। संसदीय कार्य मंत्री को निर्देश देते हुए उन्होंने यह सुनिश्चित करने को कहा कि संबंधित मंत्री समय पर सदन में मौजूद रहें।

यह भी पढ़ें: संसद में प्रश्नकाल क्यों माना जाता है सबसे अहम जवाबदेही का मंच?

सदन के भीतर बातचीत पर भी बरसे अध्यक्ष

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अध्यक्ष ने सदन के भीतर लगातार हो रही बातचीत और शोर-शराबे पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति चिंताजनक होती जा रही है कि कई सदस्य लंबे समय तक आपस में बातचीत में लगे रहते हैं, जबकि सदन की कार्यवाही चल रही होती है।

अध्यक्ष ने इस पर भी स्पष्ट संकेत दिया कि यदि भविष्य में सदस्य कार्यवाही के दौरान अनुशासनहीनता या अनावश्यक बातचीत करते पाए गए, तो आसन से उनका नाम लेकर चेतावनी दी जाएगी। उनके इस रुख को सदन में अनुशासन बहाल करने की गंभीर कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

संसदीय कार्यवाही के जानकार मानते हैं कि जब सदन में पहले से ही राजनीतिक तनाव और बहस का माहौल हो, तब छोटी-सी लापरवाही भी बड़ा संदेश दे जाती है। इसलिए अध्यक्ष की यह सख्ती केवल एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक संसदीय अनुशासन का संदेश भी मानी जा रही है।

पप्पू यादव को भी मिली फटकार

प्रश्नकाल के दौरान अध्यक्ष ने निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को भी संसदीय आचरण को लेकर कड़ी नसीहत दी। बताया गया कि वह कुछ समय तक आसन की ओर पीठ किए खड़े रहे, जिस पर अध्यक्ष ने नाराजगी जताई।

अध्यक्ष ने कहा कि एक वरिष्ठ सांसद होने के नाते उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे संसदीय नियमों, परंपराओं और आसन के सम्मान का पूरा ध्यान रखें। उनका यह हस्तक्षेप यह दिखाता है कि अध्यक्ष इस समय सदन की कार्यवाही को लेकर किसी भी तरह की शिथिलता के मूड में नहीं दिख रहे।

सरकार की किरकिरी क्यों मानी जा रही है यह घटना?

राजनीतिक रूप से यह पूरा मामला सरकार के लिए असहज माना जा रहा है, क्योंकि संसद में मंत्री की अनुपस्थिति को अक्सर विपक्ष सरकार की “लापरवाही” और “जवाबदेही से बचने” के रूप में पेश करता है। खासकर तब, जब मामला प्रश्नकाल से जुड़ा हो। प्रश्नकाल में गैरहाजिरी केवल तकनीकी भूल नहीं मानी जाती, बल्कि यह संदेश भी जाती है कि सरकार सांसदों के सवालों को कितनी गंभीरता से ले रही है।

ऐसे मामलों में विपक्ष को सरकार पर निशाना साधने का मौका मिल जाता है। हालांकि इस बार अध्यक्ष की त्वरित सख्ती ने यह संकेत जरूर दे दिया कि सदन इस तरह की लापरवाही को नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं है।

यह भी पढ़ें: संसद में मंत्री की गैरहाजिरी क्यों बन जाती है बड़ा राजनीतिक मुद्दा?

बजट सत्र का दूसरा चरण क्यों रहा चर्चा में?

इस घटना ने बजट सत्र के दूसरे चरण की उस तस्वीर को भी फिर से सामने ला दिया है, जिसमें सरकार और विपक्ष के बीच कभी टकराव तो कभी सहमति की स्थिति दिखाई देती रही। सत्र के दौरान कई मुद्दों पर तीखी राजनीतिक खींचतान देखने को मिली, तो कुछ मौकों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति भी बनी।

संसदीय हलकों में इस सत्र को इसलिए भी याद किया जा रहा है क्योंकि इसमें कई अहम राजनीतिक और विधायी घटनाएं सामने आईं। एक तरफ विपक्ष ने सरकार और संवैधानिक पदों को लेकर आक्रामक रुख दिखाया, वहीं दूसरी तरफ सरकार को भी कुछ मामलों में पीछे हटना पड़ा। हालांकि कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सरकार सफल रही।

इसी सत्र के दौरान सदन के भीतर अनुशासन, संवाद और राजनीतिक टकराव—तीनों की तस्वीर लगातार बदलती रही। ऐसे में बृहस्पतिवार की यह घटना संसद की कार्यशैली और सरकारी सतर्कता—दोनों पर एक नया सवाल खड़ा करती है।

संसदीय जवाबदेही पर फिर उठा सवाल

लोकसभा में हुई यह घटना एक बार फिर यह याद दिलाती है कि संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही तय करने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक माध्यम भी है। जब सांसद सवाल पूछते हैं, तो उनके पीछे जनता की अपेक्षाएं और क्षेत्रीय समस्याएं जुड़ी होती हैं। ऐसे में संबंधित मंत्री की अनुपस्थिति केवल एक औपचारिक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद की कमजोरी के रूप में भी देखी जाती है।

इसलिए यह जरूरी माना जा रहा है कि भविष्य में सरकार अपने संसदीय प्रबंधन को और मजबूत करे, ताकि इस तरह की स्थिति दोबारा न बने। स्पीकर की नाराजगी भी इसी व्यापक चिंता को दर्शाती है।

निष्कर्ष

लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान एमएसएमई मंत्रालय से जुड़े मंत्रियों की गैरमौजूदगी ने सरकार को असहज स्थिति में ला खड़ा किया। स्पीकर की कड़ी नाराजगी ने यह साफ कर दिया कि संसद की कार्यवाही, खासकर प्रश्नकाल, में किसी भी प्रकार की लापरवाही अब सीधे सवालों के घेरे में आएगी।

यह घटना केवल एक दिन की संसदीय चूक नहीं, बल्कि उस जवाबदेही की याद दिलाती है जो लोकतंत्र में सरकार से अपेक्षित होती है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती है और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।

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